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  • Writer's pictureKishori Raman

# वो लड़की•••• (दूसरा भाग) #


बहुत देर याद करने का प्रयास करने के बाद भी जब उसे कुछ याद नही आया तो उसने कुछ निर्णय किया। उसने झटपट अपने कपड़े पहने और होटल से बाहर आ गया। उसने एक टैक्सी लिया और उसी बुजुर्ग के घर की ओर चल दिया। दोपहर के बारह बज रहे थे। जयन्त घर से थोड़ी दूर ही टैक्सी से उतर गया। दूर से उस घर का बरामदा नजर आ रहा था जिसमे वह लड़की दो बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही थी। उस लड़की की पीठ उसकी तरफ था अतः उसने जयन्त को दुबारा आते नही देखा। जयन्त जब उस लड़की के पास पहुँच गया तो धीरे से बोला हैलो••• उस लड़की ने चौक कर उसकी ओर देखा। उसके हाथ से पुस्तक फिसल कर जमीन पर गिर पड़ी। वह अपनी जगह पर उठ कर खड़ी हो गई और आश्चर्य से जयन्त की तरफ देखने लगी। और इधर जयन्त भी उस लड़की को देखकर उछल पड़ा।मानो उसे करंट लग गया हो। वह आश्चर्य से सिर्फ इतना ही बोल सका, मंजू....तुम ? दोनो पत्थर की तरह स्थिर खड़े थे। कोई कुछ बोल नही पा रहा था बस दोनो के आँखों से झर झर आँसू बह रहे थे। जयन्त और मंजू क्लास फ्रेंड थे। दोनों एक ही कॉलेज में और एक ही क्लास में पढ़ते थे। मंजू पढ़ने में काफी तेज थी। जयन्त भी पढ़ाई में ठीक ही था पर वह क्लास में जो पढ़ाया जाता था उसे नोट नही कर पाता था और अक्सर ही अपने प्रोफेसरों की डांट सुनता था। कई बार उसने अपने साथियों से उनकी नोट बुक माँगी पर कोई भी उसे अपनी नोट बुक नही देता था। सब बस यही कहते की खुद मेहनत करो और अपना नोट खुद बनाओ। एक दिन क्लास खत्म होने के बाद भी वह अपनी जगह पर उदास बैठा हुआ था। आज भी उसे डांट पड़ी थी। सभी लोग जा चुके थे। मंजू भी जब क्लास से बाहर निकलने लगी तो जयन्त को अपनी जगह पर उदास बैठे देख कर उसके पास आई और पूछा- क्या चलना नही है ? जयन्त ने मंजू की तरफ देखा फिर अपना सर झुका लिया। मंजू भी उसके पास बैठ गई और बोली- देखो, चिंता मत करो। मैं अपनी नोट बुक देती हूँ। तुम इससे अपना नोट बुक बनाओ। जहाँ भी तुम्हे दिक्कत हो मुझसे डिसकस करो और पढ़ाई में हम दोनों एक दूसरे की मदद करेंगे। क्यो, ठीक है न ? जयन्त मुहँ से कुछ बोल नही सका। बस सहमति में अपना सर हाँ में हिलाया। मंजू ने अपनी नोट बुक उसे थमाई और क्लास रूम से बाहर निकल गयी। इसके बाद अक्सर दोनो लीजर पीरियड में मिलते और पढ़ाई पर डिस्कशन होता। शीघ ही दोनो के ग्रुप में कुछ और छात्र भी शरीक हो गए। जहाँ भी किसी को दिक्कत होता सब एक दूसरे की मदद करते। मंजू के पास अक्सर किताबे नही होती थी और वो नोट बनाने के लिए जयन्त से किताबे लेती थी। और इसका फायदा जयन्त को मिला। मिड टर्म एग्जाम में उसे काफी अच्छे नंबर मिले और मंजू ने उसकी काफी प्रसंशा की। जयन्त में काफी कॉन्फिडेंस आ गया और वह और भी अच्छा करने के लिए और मेहनत करने लगा। अब जयन्त के मन मे मंजू के लिये इज्जत और बढ़ गई थी। मंजू पढ़ाई लिखाई के अलावा और कुछ बात नही करती थी। मंजू देखने मे थी तो सुन्दर पर उसका पहनावा और रहन सहन बड़ा ही साधारण पर शालीन था। फैशन और दिखावा में वह बिश्वास नही करती थी। एक दिन बड़ी हिम्मत जुटा कर जयन्त ने मंजू से पूछ ही लिया था कि उसका आगे का क्या प्लान है ? इस पर उसने बडी बेबाकी से कहा था कि वह आगे भी पढ़ना चाहती है और प्रोफेसर बनना चाहती है पर शायद यह सम्भव न हो सके। क्यो भला ? जयन्त ने आश्चर्य से पूछा। तुम तो पढ़ने में इतनी अच्छी हो। मुझे पूरा बिश्वास है कि तुम एक दिन अवश्य ही प्रोफेसर बनोगी। शुक्रिया कहते हुए मंजू की आँखे भर आईं। उसने अपने आँसू जयन्त से छुपाने के लिए अपनी नजरें घुमा ली। जयन्त घबरा गया। बोला, क्या मैंने कुछ गलत कहा है ? अगर ऐसा है तो मुझे माफ़ कर दो। नही..नही , ऐसी कोई बात नही। दरअसल मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नही है। ग्रेजुएशन के बाद मैं शायद ही अपनी पढ़ाई जारी रख सकूँ। मेरे पिता जी की प्राथमिकता मेरे बड़े भाई की पढ़ाई है। उन्हें लगता है कि बेटी तो शादी के बाद अपनी ससुराल चली जायेगी अतः उसे पढ़ा कर क्या फायदा ? जबकि बेटा साथ रहेगा और बुढ़ापे का सहारा बनेगा। और जब ग्रैजुएशन का रिजल्ट आया तो जयन्त और मंजू दोनो काफी अच्छे नंबरों से पास हुए थे। जयन्त के घर मे तो किसी को बिश्वास ही नही हो रहा था की उसने इतने अच्छे नंबर लाये हैं। अब जयंत के पिता ने जयन्त को सलाह दी कि दिल्ली जाकर आई ए एस की तैयारी करें। साथ ही बैंक पी ओ इत्यादि की भी परीक्षा दे। जयन्त अपने अंदर आये इस बदलाव का श्रेय मंजू को देता था तथा उसे मन ही मन चाहने भी लगा था पर उसकी हिम्मत नही होती थी कि वो मंजू से अपने दिल की बात कर सके। हाँ, कई बार उसे ये लगा था कि मंजू भी चोरी छिपे उसे देखती है और उससे प्यार करती है पर अपनी पारिवारिक एवं आर्थिक स्थिति के कारण कुछ कह नही पाती है। और आज करीब बारह सालों के बाद जयन्त मंजू से मिल रहा था, और वह भी उस स्थिति में जिसकी उसने कल्पना भी नही की थी। मंजू ने बच्चो की छुट्टी कर दी। फिर एक कुर्सी जयन्त के लिए लगाई और घर के अंदर चली गई। कुछ ही देर मे चाय के दो कप ट्रे में लेकर बाहर आई और जयन्त के सामने दूसरी कुर्सी पर बैठ गई। दोनो चाय पीने लगे। कुछ देर खामोशी रही फिर मंजू ने जयन्त से पूछा, तुम यहाँ दुबारा क्यों आये ? क्योंकि मुझे तुम्हारी आवाज, तुम्हारी चाल, तुम्हारी लिखावट सब कुछ जाना पहचाना सा लग रहा था। फिर तुम्हारा चेहरे को ढकना शक पैदा कर रहा था। और मेरा दिल भी कह रहा था कि कोई मेरा बहुत ही अजीज मुझसे छुपने की कोशिश कर रहा है। तो दिल के हाथों मजबूर हो मैं यहाँ दुबारा आ गया। फिर उसने मंजू की आँखों मे आँखे डालकर पूछा, क्या मैंने अपने कॉलेज के दोस्त के पास आकर कोई ग़लती की ? नही..नही, ऐसा मैंने कब कहा ? हकलाते हुए मंजू ने कहा। वैसे आज भी तुम बहुत सुंदर लग रही हो। कहते हुए जयन्त के चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान तैर गई। धत..शरमाते हुए मंजू ने अपनी नजरें झुका ली फिर धीरे से बोली, छोड़ो इनसब बातों को। अब तो मैं पैतीस की हो गई हूँ। मेरे बाल भी पकने लगे हैं। तुम्हे मेरे चेहरे पर झुर्रियां दिखाई नही देती ? मैं भला कौन सा पच्चीस का रह गया हूँ ? जयन्त बोला। इस पर मंजू बोली -अच्छा, छोड़ो इन सब बातों को और अपने बारे में बताओ। ये तो मैं देख ही रही हूँ कि तुम बैंक के बड़े अधिकारी बन गये हो पर अपने परिवार अपने बीबी बच्चो के बारे में बताओ। कौन सा परिवार ? कौन से बीबी बच्चे ? मैंने तो अभी तक शादी ही नही की है। क्या ? मंजू चौक पड़ी और पूछी क्यो ? क्योंकि मुझे अपने कॉलेज की दोस्त मंजू की तलाश थी। अब जब वह मुझे मिल गईं है तो मेरी शादी भी हो ही जाएगी। पर हाँ, मुझे इसके लिये उसके हाँ का इंतेज़ार रहेगा। और अब चुकि कहानी लम्बी हो रही है इसलिए संक्षेप में आगे की बात बताता हूँ। जयन्त ने रवि के बीजा पासपोर्ट और उसके विदेश के पते के साथ ही उसके एम्प्लॉयर के बारे में पूरी जानकारी इकट्ठी कर ली। पहले बैंक के तरफ से उसके विदेश के पते पर कानूनी नोटिस भेजा। जब उस नोटिस का असर नही हुआ तो उसके एम्प्लॉयर को नोटिस गया। फिर तो नौकरी जाने के डर से रवि ने कुल बकाया ऋण राशि का पचास प्रतिसत तुरन्त जमा कराया और बाकी तीन मासिक किस्तो में कर के जमा करा दिया। मंजू का घर बैंक के बंधक से मुक्त हो गया। मंजू को एक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई और घर का खर्च आराम से चलने लगा। अब पाठक गण अवश्य ही जानना चाहेगे की जयन्त और मंजू का क्या हुआ ? क्या दोनों ने शादी की ? मेरी तो राय है कि दोनों दोस्त को अब शादी कर ही लेनी चाहिए। आपकी क्या राय है ? (समाप्त) किशोरी रमण BE HAPPY....BE ACTIVE...BE FOCUSED...BE ALIVE If you enjoyed this post, please like , follow,share and comments. Please follow the blog on social media.link are on contact us page. www.merirachnaye.com




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2 Comments


sah47730
sah47730
Dec 20, 2021

वाह! कहानी तो शानदार है।इसमें सामाजिक दोष,मजबूरी,पिता द्वारा बेटा बेटी के प्रति सोच में अन्तर,बेटी की विवशता,पुत्र की दगाबाजी, कालेज के दिनों के मित्रवत सम्बन्धों में पनपता प्यार आदि मिलकर कहानी को रोचक वउत्सुकता पैदा करने वाला बनाता है।

:मोहन"मधुर"

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Unknown member
Dec 20, 2021

Very nice....

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