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  • Writer's pictureKishori Raman

# सही ज्ञान का न होना #

Updated: Nov 13, 2021



हमारा जीवन अनमोल है पर इसके सही मूल्य को हम समझ नही पाते हैं। हम धन दौलत कमाने को ही जीवन का उद्देश्य समझते है और पाप, वासना, क्रोध,और मोह में लिप्त हो सारी ज़िन्दगी गुजार देते। जब हमें ये समझ आती है कि ये तो एक छलावा है तब तक देर हो चुकी होती है। तब हमारे पास उस लकड़हारे की तरह पछताने के अलावा और कोई चारा नही होता है जिसकी कथा बुद्ध ने अपने शिष्यों को सुनाई थी।


एक दिन एक राजा जंगल में शिकार के लिए गया तो रास्ता भूल गया। उसने बहुत देर तक रास्ता खोजने का प्रयास किया लेकिन असफल ही रहा। अब वह काफी थक चुका था। भूख और प्यास के मारे उसका बुरा हाल था। वह सोच रहा था कि अब क्या करें तभी उसने देखा कि एक लकड़हारा जंगल में लकड़ियां काट रहा है। वह उस लकड़हारे को देखकर बहुत खुश हुआ और उसे उम्मीद हुई कि अब वो रास्ता पा लेगा। वह लकड़हारे के पास गया। उसने देखा कि अब बहुत थोड़े से ही पेड़ बच रहे हैं। राजा ने लकड़हारे के पास जाकर कहा, मैं अपना रास्ता भूल गया हूँ। मैं भूखा भी हूं। मुझे जोरों की प्यास भी लगी है। तुम्हारे पास कुछ खाने को है क्या ? इस पर लकड़हारा बोला हां, मेरे पास रोटी है। फिर उसने अपनी पोटली खोल कर उसमे से एक मोटी सी रोटी निकाली और उसे खाने के लिए राजा को दे दिया। फिर वह बोला, आप इस पेड़ के नीचे बैठ कर रोटी खाए तबतक मैं सामने की बावड़ी से पानी लेकर आता हूँ। राजा ने देखा कि मोटी रोटी के साथ थोड़ी सब्जी भी है। राजा ने लकड़हारे की दी हुई सब्जी रोटी खाई और साथ में उसके द्वारा लाया गया बाबड़ी का ठंडा पानी भी पिया। खाना खाकर और पानी पीकर उसने लकड़हारे से कहा, मैं पास के राज्य का राजा हूं। मैं जंगल मे शिकार करने आया था और अपना रास्ता भूल गया हूँ । लकड़हारे ने राजा को रास्ता बता दिया। जाते समय राजा ने कहा, मुसीबत के समय तुमने मेरी मदद की है। अगर कभी तुम्हें किसी चीज की जरूरत पड़ी तो मेरे पास आ जाना। मैं तुम्हारी सहायता जरूर करूंगा। कुछ समय यूं ही गुजर गया। धीरे-धीरे जंगल के सभी पेड़ कट गये।लकड़हारा लकड़ी काटकर इनसे कोयला बनाकर बेचा करता था। अब वह अपनी जीविका चलाये तो कैसे ? वह दुखी होकर राजा के पास पहुंचा। राजा के सेवकों ने राजा को सूचना दी कि एक लकड़हारा उनसे मिलना चाहता है। राजा को याद हो आया कि एक लकड़हारे को मदद का आश्वासन दिया था । एक दिन उसने मेरे प्राण बचाए थे। राजा ने अपने सैनिकों को उस लकड़हारे को अपने पास लाने को कहा। सैनिको ने उसे राजा के पास ले जाकर खड़ा कर दिया। राजा ने लकड़हारे से पूछा, क्यों भाई लकड़हारे उदास क्यों हो ? लकड़हारे ने कहा, महाराज, मैं जंगल में लकड़ियां काटता था। वह सारा जंगल समाप्त हो चुका है। अब वहाँ एक भी पेड़ नहीं बचा है। मेरे पास आजीविका का कोई दूसरा साधन नहीं है इसलिए आपकी शरण में आया हूं। आपके राज्य में अगर कोई जंगल है तो उनमें से एक छोटा सा टुकड़ा मुझे देने की कृपा करें। राजा ने कहा कि समस्या का समाधान किया जाएगा।


उस लकड़हारे के चले जाने के बाद राजा ने अपने मंत्रियों से परामर्श किया कि लकड़हारे को क्या दिया जाए ? विमर्श के बाद निर्णय हुआ कि शहर के दक्षिण में जो चंदन का जंगल है वह लकड़हारे को दे दिया जाए। पदाधिकारियों को बुलाया गया और वह चंदन का वन लकड़हारे के नाम कर दिया गया। लकड़हारे को इसकी सूचना दे दी गई कि आज से ये वन तुम्हारा हुआ। कई वर्ष बीत गए। एक बार राजा दरबार में बैठा था कि उसे लकड़हारे का ध्यान आया। प्रसन्न होकर उसने सोचा कि अब तो लकड़हारा बहुत अमीर इंसान बन चुका होगा। उसने कई भवन और महल बनवा लिए होंगे, इसलिए चल कर उसे देखना चाहिए। राजा अपने मंत्रियों को साथ लेकर उस वन में गया जो लकड़हारे को दिया गया था। पर वहां कोई वन नहीं था। वहां चंदन का कोई भी पेड़ नहीं था। राजा ने घबराकर अपने मंत्री से पूछा,अरे भाई, वह जंगल कहां है ? जो हमने लकड़हारे को दिया था।


राजा ने फिर कहा- वह जंगल कहीं और होगा। तुम मुझे गलत स्थान पर ले आए हो। मंत्री ने कहा महाराज, वह जंगल तो इसी स्थान पर था। राजा ने कहा फिर वह गया कहां ? खोज करने पर कुछ ही दूरी पर चंदन के कुछ पेड़ दिखाई पड़े। उनके बीच ही वह लकड़हारा बैठा हुआ था। निराश और उदास। राजा ने उसके पास जाकर पूछा ? अरे तू उदास क्यों है ? लकड़हारे ने उन्हें प्रणाम कर कहा -अन्नदाता,इतने दिन तो आपकी कृपा से काम चलता रहा पर यह जंगल भी थोड़े से रह रहे हैं। मैं सोच रहा हूं कि अब आगे हमारी जीविका कैसे चलेगी ? राजा ने आश्चर्य से पूछा, अब तो थोड़े से ही रह रहे हैं बाकी पेड़ो का क्या किया ? लकड़हारे ने कहा रोज लकड़ी काटता हूं, कोयला बनाता हूं और उसे बाजार में ले जाकर बेच देता हूं । यह सुनते ही राजा ने अपना सिर पीट लिया और दुखी होते हुए कहा, अरे भाग्यहीन, तूने यह क्या किया ? यह चंदन की लकड़ी है। इसे जलाकर कोयला क्यों बना दिया ? लकड़हारे ने पूछा यह चंदन क्या होता है ? इस पर राजा बोला ,अच्छा होता अगर तुम जानता कि चंदन क्या होता है ? आज तुम दो-तीन हाथ लकड़ी काट लो और इसे बाजार में जाकर बेंच दो। हां ध्यान रखना कि इसका कोयला मत बना देना।


अब लकड़हारा थोड़ी सी लकड़ी काटता है और उसको लेकर बाजार में जाता है। एक दुकानदार ने देखकर पहचान लिया कि असली चंदन की लकड़ी है और लकड़हारा मूर्ख लगता है। उसने पूछा, इसके क्या लोगे ? लकड़हारे ने कहा तुम क्या दोगे ? एक रुपया, दुकानदार बोला। लकड़हारे ने आश्चर्य से बोला - बोला क्या ? एक रुपया ? यानी कि इतना अधिक ? पर दुकानदार ने समझा कि लकड़हारा जानता है अतः फिर बोला दो रुपया। क्या ? दो रुपये। लकड़हारा और आश्चर्य से चीखा। अब दुकानदार ने कहा,अच्छा इसके चार रुपये ले लेना। कुछ ही दूरी पर एक और दुकानदार खड़ा था। उसने देखा कि एक दुकानदार कीमती वस्तु को कौड़ियों के भाव खरीद रहा है। उसने लकड़हारे को पुकार कर कहा कि तुम इधर आओ, मैं तुम्हें इसके दस रुपये दूँगा। लकड़हारे ने जब दस रुपये सुना तो वहीं सर पकड़ कर बैठ गया और अपना सिर घुटनों में रखकर रोने लगा। अब उसे मालूम हुआ कि जिस लकड़ी का कोयला बनाकर वह बेचता था वह कितना मूल्यवान था। उसने कितनी ज्यादा संपत्ति का अपने हाथों से ही नाश कर दिया था।


कहानी को खत्म करते हुए बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा, उस लकड़हारे की मूर्खता पर आप लोगो को दया आ रही होगी। सुनो मेरे शिष्यों, हम स्वयं भी तो उस लकड़हारे की तरह ही है। राजाओं के राजा परमपिता परमेश्वर ने ना जाने किस बात से प्रसन्न होकर हमें यह यह सांसे और यह चंदन सा जीवन दिया था, पर हमने अपने गलत वासनाओं घृणा और पाप की अग्नि से इसे जलाकर भस्म कर दिया है । इतनी मूल्यवान है ये सांसे यह हमने समझा ही नहीं। सांसो का यह चंदन बृक्ष से परिपूर्ण वन जिसे हमने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार की अग्नि में जलाकर कोयला बना दिया है। परंतु जो होना था वह हो गया।अब उसे बदला नहीं जा सकता था। अब जो चंदन का थोड़ा सा बृक्ष यानी अब हमारा आगे का जो जीवन बचा है आओ इन्हीं का उचित उपयोग करें और अपने जीवन को शांति सुख और समृद्धि से भरें। सही ज्ञान ना होने के कारण उस लकड़हारे को भी बहुत दुख हुआ लेकिन तब तक समय उसके हाथों से रेत की तरह फिसल चुका था।


किशोरी रमण



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